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Udeshya

Udeshya

ऋषि - मुनियों की तपस्या के द्वारा ईश्वरीय कृपा से प्राप्त भारतीय संस्कृति में मनुष्यों को ज्ञान, शक्ति, विद्या, बुद्धि, बल, धन, धान्यंसंपदा, समृद्धि व मोक्ष की प्राप्ति के अनेकों साधन बताएं गए हैं l

उनमें यज्ञ जीव के कल्याण का एक उत्कृष्ट साधन है l (गीता 3:9)

सूक्ष्म प्रकृति से शास्त्रानुसार यज्ञहवन करने के द्वारा जो उर्जा उत्पन्न होती है l उससे अपना तथा अपनो और अन्य लोगों का कल्याण सहज ही किया जा सकता है अर्थात्भौतिक जगत में जीवन को प्रगति की ओर अग्रसर करने के लिए यज्ञ प्रक्रिया पूरी तरह से समर्थ है। इस सामर्थ्य का विज्ञान काफी गहरा और विस्तृत है।

जिस प्रकार किसान के द्वारा मिट्टी में बोया हुआ बीज सौ गुना होकर वापस किसान को मिल जाता है, ठीक उसी प्रकार अग्नि में हो माहुआ पदार्थ लाख गुना होकर यज्ञकर्ता को वापस प्राप्त हो जाता है। अग्नि के सम्पर्क में कोई भी द्रव्य आने पर वह सूक्ष्मीभूत होकर पूरे वातावरण में फैल जाता है और अपने गुण से लोगों का कल्याण करता है।

यज्ञ की महिमा अनन्त है। यज्ञ से आयु, आरोग्यता, तेजस्विता, विद्या, यश, पराक्रम, वंशवृद्धि, धन-धन्यादि, सभी प्रकार की राज-भोग, ऐश्वर्य, लौकिक एवं पार लौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है ।

यज्ञ करने से समष्टिका कल्याण होता है। अब इस बात को वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि यज्ञ करने से वायुमंडल एवं पर्यावरण में शुद्धता आती है। संक्राम करोग नष्ट होते हैं तथा समय पर वर्षा होती है । यज्ञ करने से सहबन्धुत्व की सद्भावना के साथ उतरोत्तर विकास में गति तथा विश्व में शांति स्थापित होती है।

यज्ञ को वेदों में 'कामधेनुं' कहा गया है अर्थात् ‘यजुर्वेद में इसे मनुष्य के समस्त अभावों एवं बाधाओं को दूर करने वाला बताया है वहाँ कहा गया है कि जो यज्ञ को त्यागता है उसे परमात्मा त्याग देता है।यज्ञ के द्वारा ही साधारण मनुष्य देव-योनि प्राप्त करते हैं और स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। यज्ञ को सर्व कामना पूर्ण करने वाला कल्प वृक्ष और स्वर्ग की सीढ़ी भी कहा गया है। इतना ही नहीं यज्ञ के द्वारा आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर की प्राप्ति होती है।

भारत को विश्व गुरु की ओर ले चलने के लिए ऋषि मुनियो की यज्ञ परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का आयोजन किया गया है।

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