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Why in Gujarat ?

Why in Gujarat ?

यज्ञ स्थल पर फिर से यज्ञ


इतिहास अपने आपको दोहराता रहता है ।

विश्व की भिन्न भिन्न संस्कृतियो का विकास अलग अलग नदियों के तटों पर हुआ हैं ।

वैदिक पौराणिक और अन्य धर्म ग्रंथो में भारत की भौगोलिक स्थिति का वर्णन विस्तार से पाया जाता है ।

मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है क़ि सरस्वती तथा द्रुशहवति के मध्य जिस प्रदेश का निर्माण देवताओं ने किया वह ब्रह्मावर्त है ।

ऋग्वेद में सरस्वती नदी को रक्षक, पोषक, रोद्र, आवाहन, भौतिकी, सप्त्स्वास, माता व देवी इत्यादि नामों से निरूपण किया गया है ।

वामन पुराण के अनुसार महर्षि मार्कण्डेय के यज्ञ स्थल के निकट सरस्वती नदी बहती थी ।

गुजरात प्रदेश में सौराष्ट्र के प्रवेश द्वार पर महायज्ञ के स्थल का निश्चित होना स्वयं रचयिता की ओर से स्वीकृति प्रदान करना है ।

ब्रह्मावर्त प्रदेश में बगोदारा नगर के समीप नल सरोवर की स्थिति इस बात का बड़ा प्रमाण है ।

आयोजको के द्वारा यज्ञ मंडप की आकृति श्रीयंत्र के स्वरूप में बनाना ।

यज्ञ का नाम लक्ष्मीनारायण यज्ञ रखना ।

गुजरात में ही क्यों और यहीं स्थल क्यों ?

यह इतिहास की पुर्नावती है ।

गुजरात ने हमेशा भारत की समृद्धि में प्रमुख योगदान दिया है और इस पवनभूमि पर महायज्ञ से राष्ट्र की समृद्धि और बढ़ेगी ।

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